धर्मी दुःख क्यों उठाते हैं और दुष्ट क्यों फलते-फूलते हैं? न्याय कहाँ है?
इस संसार में हम अक्सर देखते हैं कि लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं होता। हम धर्मियों को दुःख उठाते और दुष्टों को फलते-फूलते देखते हैं। लेकिन ऐसा क्यों है? बाइबल के अनुसार, जिनके साथ अन्याय होता है, परमेश्वर उन्हें न्याय देता है।
6यहोवाह सभी दुःखितों के निमित्त धार्मिकताएवं न्यायसंगतता के कार्य करते हैं.( स्तोत्र 103:6 )
लेकिन यदि परमेश्वर न्याय देता है, तो फिर हमें अपने चारों ओर इतना अन्याय क्यों दिखाई देता है?
आइए अतीत में झाँकें। हमें एक-दूसरे के साथ न्याय करना था, एक-दूसरे की सहायता करनी थी और एक-दूसरे में प्रेम फैलाना था। इसके बजाय, हमने यहाँ पृथ्वी पर परमेश्वर की आँखों के सामने क्रूर काम किए।
37उन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियों को प्रेतोंके लिए बलि कर दिया.38उन्होंने निर्दोषों का रक्त बहाया,अपने ही पुत्रों और पुत्रियों का रक्त,जिनकी उन्होंने कनान देश की प्रतिमाओं को बलि अर्पित की,और उनके रक्त से भूमि दूषित हो गई.39अपने कार्यों से उन्होंने स्वयं को भ्रष्ट कर डाला;उन्होंने अपने ही कार्यों के द्वारा विश्वासघात किया.40ये सभी वे कार्य थे,जिनके कारण यहोवाह अपने ही लोगों से क्रोधित हो गएऔर उनको अपना निज भाग उनके लिए घृणास्पद हो गया.( स्तोत्र 106:37-40 )
और आज के आधुनिक समय में भी हम ईमानदारी से अपने आप को देखने से डरते हैं। केवल अपने कामों को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों और इच्छाओं का भी निष्पक्ष रूप से मूल्यांकन करने से। अपने बारे में किसी की ईमानदार राय को स्वीकार करना बहुत कठिन होता है। इसके बजाय, हम मीठा झूठ पसंद करते हैं।
10ऐसे लोग हैं जो अदालत में न्याय का पक्ष लेनेवाले से घृणा करते हैंऔर सत्य बोलने वाले को तुच्छ समझते हैं.( आमोस 5:10 )
सदियों से हम मनुष्य अपने जैसे दूसरे मनुष्यों का न्याय निष्पक्षता से नहीं करते आए हैं। और हमारा परमेश्वर इसे अनदेखा नहीं कर सकता था। यद्यपि यरूशलेम उन लोगों का नगर था जिनसे परमेश्वर गहरा प्रेम करता है, फिर भी उसे सबकी तरह न्याय का सामना करना पड़ा। हम बुरे काम करते हुए यह भरोसा नहीं रख सकते कि परमेश्वर हमें सदा क्षमा करता रहेगा।
1“येरूशलेम के मार्गों पर इधर-उधर ध्यान करिये,इसी समय देखिये और ध्यान दीजिए,उसके खुले चौकों में खोज कर देख लीजिए.यदि वहां एक भी ऐसे मनुष्य हैंजो अपने आचार-व्यवहार में खरे हैं और जो सत्य के खोजी हैं,तो मैं सारे नगर को क्षमा कर दूंगा.( येरेमियाह 5:1 )
12न तो संसार के राजाओं को,और न ही पृथ्वी के निवासियों को इसका विश्वास हुआ,कि विरोधी एवं शत्रु येरूशलेम केप्रवेश द्वारों से प्रवेश पा सकेगा.13इसका कारण था उसके भविष्यवक्ताओं के पापतथा उसके पुरोहितों की दुष्टता,जिन्होंने नगर के मध्य हीधर्मियों का रक्तपात किया था.( विलापगीत 4:12-13 )
दूसरों के प्रति हमारे अन्याय, सत्य के प्रति हमारी घृणा, हमारे घमंड और पाप के कारण हमने अपने आप को परमेश्वर से अलग कर लिया, और अपने आप को न्याय से भी अलग कर लिया। हम जान-बूझकर स्फटिक-से निर्मल जल की झील से दूर, और दूर चले जाते हैं, प्यासे होते हैं और पुकारते हैं: “पानी कहाँ है? मुझे तो दिखाई नहीं देता!” परमेश्वर कहाँ है, क्या वह सहायता नहीं कर सकता?
1यहोवाह का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि वह उद्धार न कर सकें,न ही वह बहरे हो चुके कि सुन न सकें.2परंतु आप लोगों के बुरे कामों नेआप लोगों के एवं परमेश्वर के बीच में दूरी बना दी है;उनके मुंह को उन्होंने आप लोगों के ही पापों के कारण छिपा रखा है,ताकि वह न सुनें.3खून से आप लोगों के हाथ तथा अधर्म से आप लोगों की उंगलियां दूषित हो चुकी हैं,आप लोगों के होंठों ने झूठ बोला है.आप लोगों की जीभें दुष्टता की बातें कहती हैं.4कोई भी व्यक्ति न्याय की मांग नहीं करते;कोई भी व्यक्ति सच्चाई से मुकदमा नहीं लड़ते.वे झूठ बोलते हैं और छल पर भरोसा रखते हैं;वे अनिष्ट का गर्भधारण करते हैं तथा पाप को जन्म देते हैं.5वे विषैले सांप के अंडे सेते हैंतथा मकड़ी का जाल बुनते हैं.जो कोई व्यक्ति उनके अण्डों का सेवन करते हैं,उनकी मृत्यु हो जाती है,तथा कुचले अंडे से सांप निकलता है.6उनके द्वारा बुने गए जाल से वस्त्र नहीं बन सकते;अपनी शिल्पकारी से वे अपने आपको आकार नहीं दे सकते.उनके काम तो अनर्थ ही हैं,उनके हाथ से हिंसा के काम होते हैं.7उनके पैर पाप करने के लिए दौड़ते हैं;वे निर्दोषरक्त बहाने कोभागकर जाते हैं.उनके विचार व्यर्थ होते हैं;उनका मार्ग विनाश एवं उजाड़ से भरा है.8शांति का मार्ग वे नहीं जानते;न उनके स्वभाव में न्याय है.उन्होंने अपने मार्ग को टेढ़ा कर रखा है;इस मार्ग में कोई व्यक्ति शांति न पाएंगे.9इस कारण न्याय हमसे दूर है,धर्म हम तक नहीं पहुंचता.हम उजियाले की राह देखते हैं,यहां तो अंधकार ही अंधकार भरा है;आशा की खोज में हम अंधकार में आगे बढ़ रहे हैं.10हम अंधों के समान दीवार को ही टटोल रहे हैं,दिन में ऐसे लड़खड़ा रहे हैं मानो रात है;जो हृष्ट-पुष्ट हैं उनके बीच हम मृत व्यक्ति समान हैं.11हम सभी रीछ के समान गुर्राते हैं;तथा कबूतरों के समान विलाप में कराहते हैं.हम न्याय की प्रतीक्षा करते हैं, किंतु न्याय नहीं मिलता;हम छुटकारे की राह देखते हैं, किंतु यह हमसे दूर है.( यशायाह 59:1-11 )
हाँ, हमने पाप किया है। और हाँ, हम अब भी पाप करते हैं। हमसे गलतियाँ हुई हैं। फिर भी हम परमेश्वर के सामने अपना हृदय खोल सकते हैं, पश्चाताप कर सकते हैं और क्षमा माँग सकते हैं। और जब हम परमेश्वर के लिए अपना हृदय खोलें, तो आइए अब से उसे पाप के लिए बंद कर दें।
12“इसलिये, हे मानव-पुत्र, अपने लोगों से कहिये, ‘यदि कोई धर्मी व्यक्ति आज्ञा नहीं मानते हैं, तो उनके पहले के धर्मीपन का कोई मतलब नहीं होगा. और यदि कोई दुष्ट व्यक्ति पश्चात्ताप करते हैं, तो उन व्यक्ति के पहले की दुष्टता के कारण उन्हें दंड नहीं मिलेगा. जो धर्मी व्यक्ति पाप करते हैं, वह जीवित नहीं रहेंगे, यद्यपि वह पहले धर्मी थे.’ 13यदि मैं किसी धर्मी व्यक्ति से कहता हूं कि वह निश्चय जीवित रहेंगे, पर तब वह अपने धर्मीपन पर भरोसा करके दुष्टता करने लगते हैं, तब उनके द्वारा किया गया कोई भी धर्मीपन का काम याद नहीं किया जाएगा; वह अपने किये गए दुष्ट काम के कारण मरेंगे. 14और यदि मैं किसी दुष्ट व्यक्ति को यह कहता हूं, ‘आप निश्चय मरेंगे,’ पर तब वह अपने पाप से मन फिराते हैं और वही करते हैं जो सही और न्यायसंगत है— 15यदि वह कर्जा देने के बदले रखे गए बंधक की वस्तु को लौटा देते हैं, चोरी की वस्तु को लौटा देते हैं, जीवन देने वाले नियमों का पालन करते हैं, और दुष्टता नहीं करते—तब वह व्यक्ति निश्चय जीवित रहेंगे; वह नहीं मरेंगे. 16उनके द्वारा किया गया कोई भी पाप याद नहीं किया जाएगा. उन्होंने सही और न्यायसंगत काम किया है; वह निश्चय जीवित रहेंगे.17“फिर भी आपके लोग कहते हैं, ‘प्रभु की नीति न्यायसंगत नहीं है.’ पर यह उनकी नीति है जो न्यायसंगत नहीं हैं.( यहेजकेल 33:12-17 )
हम निश्चिंत हो सकते हैं कि परमेश्वर हमारी सुनेगा। हम निश्चिंत हो सकते हैं कि अपने पापों से मुड़ने, क्षमा पाने और परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने में कभी देर नहीं होती।
13जैसे पिता की सहानुभूति उनकी संतानों पर होती है,वैसे ही यहोवाह की सहानुभूति उनके श्रद्धालुओं पर स्थिर रहती है;( स्तोत्र 103:13 )
19अपने सभी प्रेम करने वालों को मैं ताड़ना देता तथा अनुशासित करता हूं. इसलिये बहुत उत्साहित होकर मन फिराव कीजिए.( प्रकाशन 3:19 )
और निःसंदेह न्याय की जीत होगी, और हर किसी को वही मिलेगा जिसका वह हकदार है।
10“मैं यहोवाह, हृदय की विवेचना करता हूं.मैं मस्तिष्क का परीक्षण करता हूं,कि हर एक व्यक्ति को उनके आचरण के अनुरूप प्रतिफल दूं,उनके द्वारा किए कार्यों के परिणामों के अनुरूप.”( येरेमियाह 17:10 )
फिर भी, सचमुच धर्मी लोग दुःख क्यों उठाते हैं?
यदि हम इस तथ्य को भूल भी जाएँ कि पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति निष्पाप नहीं है, तब भी हमें याद रखना चाहिए कि हम हमेशा परमेश्वर के मार्गों को नहीं समझ सकते। भले ही हम यह समझ लें कि भला और बुरा क्या है, फिर भी हम उस ज्ञान को ठीक से लागू नहीं कर पाते, क्योंकि हम पूरी तस्वीर नहीं देखते।
9“क्योंकि जिस प्रकार आकाश और पृथ्वी में अंतर है,उसी प्रकार मेरे और आपके कामों में बहुत अंतर हैतथा मेरे और आपके विचारों में भी बहुत अंतर है.( यशायाह 55:9 )
और हम हमेशा यह नहीं समझ पाएँगे कि जिन भले लोगों को हम जानते हैं, उनके जीवन में इतने सारे दुःख क्यों आए। लेकिन आइए बाइबल में दुःख उठाने वालों के कुछ उदाहरण देखें। यूसुफ की कहानी याद कीजिए, जो एक दास से उठकर मिस्र का दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बना।
17तब परमेश्वर ने एक पुरुष, योसेफ़ को,जिन्हें दास बनाकर उस देश में पहले भेज दिया.18उन्होंने योसेफ़ के पैरों में बेड़ियां डालकरउन पैरों को ज़ख्मी किया था,उनकी गर्दन में भी बेड़ियां डाल दी गई थीं.19तब योसेफ़ की पूर्वोक्ति सत्य प्रमाणित हुई, उनके विषय में,यहोवाह के वक्तव्य ने उन्हें सत्य प्रमाणित कर दिया.( स्तोत्र 105:17-19 )
जिस आशीष की यूसुफ प्रतीक्षा कर रहा था, उसे पाने से पहले वह कई परीक्षाओं से गुज़रा। और जो परीक्षाएँ उस पर आईं, वे आवश्यक रूप से उसके पापों का दंड नहीं थीं, बल्कि सीखने की एक ज़रूरी प्रक्रिया थीं, जिसने उसे उस ऊँचे पद के योग्य बनाया जो उसे मिलने वाला था।
स्वयं यीशु ने भी पृथ्वी पर अपने जीवन में दुःख उठाया, यद्यपि उसने कोई पाप नहीं किया था।
8पुत्र होने पर भी, उन्होंने अपने दुःख उठाने से आज्ञा मानने की शिक्षा ली.( इब्री 5:8 )
हम में से कुछ ने अपने माता-पिता या प्रियजनों को खोया है। हमने दिन-रात परमेश्वर से उनके प्राण बचाने की प्रार्थना की, फिर भी उनकी मृत्यु हो गई। परमेश्वर हमारी क्यों नहीं सुनता?
जब हमारे प्रियजन मर जाते हैं, तो उनसे हमारा संबंध टूट जाता है; हम न उन्हें देख सकते हैं, न उनसे बात कर सकते हैं, न उनकी मुस्कान देख सकते हैं और न उनसे उत्साह बढ़ाने वाली सलाह पा सकते हैं। हम उनकी मृत्यु को ऐसा अंत मानते हैं जहाँ हम कुछ नहीं कर सकते... लेकिन परमेश्वर कर सकता है। परमेश्वर के लिए एक भी व्यक्ति मरा हुआ नहीं है। परमेश्वर हमारी और हमारी प्रार्थनाओं की सुनता है। वह हमारी भलाई चाहता है, लेकिन वह उनकी भलाई भी चाहता है जिन्हें हमने खो दिया है।
1धर्मी व्यक्ति नाश होते हैं,और कोई व्यक्ति इस बात की चिंता नहीं करते;भक्त उठा लिये जाते हैं,परंतु कोई व्यक्ति नहीं सोचते.धर्मी जन आनेवाली परेशानी सेबचने के लिये उठा लिये जाते हैं.2वे शांति पहचानते हैं,वे अपने बिछौने57:2 बिछौने मृत्यु का भी हो सकता है. पर आराम पाते हैं;जो सीधी चाल चलते हैं.( यशायाह 57:1-2 )
क्या आप मानते हैं कि आप परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य हैं, फिर भी जीवन आपके लिए बहुत कठिन है? एक प्रेमी पिता की तरह, हमारा परमेश्वर हमें सिखाता है और अनुशासित करता है, हमें शुद्ध करता है और परमेश्वर का वरदान पाने के लिए तैयार करता है।
7सताहट को अनुशासन समझकर सह लीजिए. परमेश्वर का आप लोगों के साथ वैसा ही व्यवहार है, जैसा पिता का अपनी संतान के साथ होता है. भला कोई संतान ऐसी भी होती हैं, जिन्हें पिता अनुशासित न करते हों? 8अनुशासित तो सभी किए जाते हैं, किंतु यदि आप लोग अनुशासन की भागी नहीं होते हैं, तो आप लोग उनकी संतान नहीं बल्कि अवैध संतान हैं. 9इसके अतिरिक्त हमें अनुशासित करने के लिए हमारे शारीरिक पिता हैं, जिनका हम सम्मान करते हैं. परंतु क्या यह अधिक सही नहीं कि हम आत्माओं के पिता के अधीन रहकर जीवित रहें! 10हमारे पिता, जैसा उन्हें सबसे अच्छा लगा, हमें थोड़े समय के लिए अनुशासित करते रहे किंतु परमेश्वर हमारी भलाई के लिए हमें अनुशासित करते हैं कि हम उनकी पवित्रता में भागीदार हो जाएं. 11किसी भी प्रकार का अनुशासन उस समय तो आनंद कर नहीं परंतु दुःखकर ही प्रतीत होता है, किंतु जो इसके द्वारा शिक्षा प्राप्त करते हैं, बाद में उनमें इससे धार्मिकता की शांति भरा प्रतिफल इकट्ठा किया जाता है.( इब्री 12:7-11 )
6इसके प्रति आशा आप लोगों के अतीव आनंद का आधार है यद्यपि इस समय थोड़े समय के लिए आप लोगों को अनेक प्रकार की परीक्षाएं सहना ज़रूरी हो गया है 7कि येशु मसीह के दोबारा आगमन के अवसर पर आप लोगों के विश्वास के प्रमाण का परिणाम प्रशंसा, गौरव और सम्मान में देखा जा सके. आप लोगों का यह विश्वास नाशमान सोने से कहीं अधिक कीमती है—यद्यपि इसे आग में परखा जाता है.( 1 पेतरॉस 1:6-7 )
हम कुकर्मियों को शांत जीवन बिताते, न्याय से बचते और अनेक सुखों का आनंद लेते देखते हैं। उनमें से कुछ ने हमारे जीवन तबाह किए हैं और अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए दूसरों का इस्तेमाल करने में आनंद लेते हैं। हमें उन पर कोई न्याय होता दिखाई नहीं देता। फिर भी, हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे परमेश्वर के न्याय से बच सकते हैं।
4मृत्यु तक उनमें पीड़ा के प्रति कोई संवेदना न थी;उनकी देहें स्वस्थ तथा बलवान थीं.5उन्हें अन्य मनुष्यों के समान सामान्यसमस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता;उन्हें परिश्रम भी नहीं करना पड़ता.6अहंकार उनके गले का हार है;तथा हिंसा उनका वस्त्र.7उनके संवेदन शून्य हृदय से अपराध ही निकलता है;उनके मस्तिष्क में घुमड़ती दुष्कल्पनाओं की कोई सीमा ही नहीं है.8वे उपहास करते रहते हैं, बुराई करने का वार्तालाप करते हैं;तथा अहंकार के साथ वे उत्पीड़न की धमकी देते हैं.9उनकी डींगे आकाश तक ऊंची होती हैं,और वे दावा करते हैं कि वे पृथ्वी के अधिकारी हैं.10इसलिये उनके लोग इस स्थान पर लौट आते हैं,और वे भरे हुए जल में से पान करते हैं.11वे कहते हैं, “यह कैसे हो सकता है,कि यह परमेश्वर को ज्ञात हो जाए?क्या परम प्रधान को इसका बोध है?”( स्तोत्र 73:4-11 )
18सचमुच में, आपने दुष्टों को फिसलने वाली भूमि पर रखा है;विनाश होने के लिए आपने उन्हें निर्धारित कर रखा है.19अचानक ही आ पड़ेगा उन पर विनाश,आतंक उन्हें एकाएक ही ले उड़ेगा!20जब दुस्वप्न के कारण निद्रा से जागने पर एक व्यक्तिदुस्वप्न के रूप से घृणा करता है,हे प्रभु, उसी प्रकार आपके जागने परउनके स्वरूप से आप घृणा करेंगे!( स्तोत्र 73:18-20 )
6अज्ञानी के लिए असंभव है इनका अनुभव करना,निर्बुद्धि के लिए ये बातें निरर्थक हैं.7यद्यपि दुष्ट घास के समान अंकुरित तो होते हैंऔर समस्त दुष्ट उन्नति भी करते हैं,किंतु उनकी नियति अनंत विनाश ही है.( स्तोत्र 92:6-7 )
19दुष्टों के वैभव को देख मत कुढ़ने लगिएऔर न बुराइयों की जीवनशैली से ईर्ष्या करिए,20क्योंकि दुष्ट का कोई भविष्य नहीं होता,उनके जीवनदीप का बुझना निर्धारित है.( सूक्ति संग्रह 24:19-20 )
याद रखिए कि परमेश्वर सदा निष्पक्ष और न्यायी है। हम हमेशा उसके मार्गों को नहीं समझते, और कभी-कभी हम दूसरों का न्याय करने में जल्दबाज़ी कर देते हैं। इसके बजाय, आइए न्याय परमेश्वर पर छोड़ दें, और अपने आसपास के हर व्यक्ति के साथ आदर और प्रेमसे व्यवहार करने की पूरी कोशिश करें।
18यहोवाह उन सभी के निकट होते हैं, जो उन्हें पुकारते हैं,उनके निकट, जो सच्चाई में उन्हें पुकारते हैं.19वह अपने श्रद्धालुओं की अभिलाषा पूर्ण करते हैं;वह उनकी पुकार सुनकर उनकी रक्षा भी करते हैं.( स्तोत्र 145:18-19 )
8यहोवाह ही आपके अगुए होंगे. वह आपके साथ साथ रहेंगे, वह न आपको निराश करेंगे और न ही आपका साथ छोड़ेंगे. आप न तो भयभीत होवें और न हतोत्साहित.”( व्यवस्था 31:8 )